राजनीति बेफिजूल की
सिंगुर की नैनो प्रोजेक्ट की तरह रायबरेली की रेल कोच फैक्ट्री भी राजनीति की भेंट चढ़ गई। इसमे भी किसानों को ही मुद्दा बनाया गया है। किसानों को लेकर चल रही राजनीति से यह बात बिल्कुल भी स्पष्ट हो जाती है की चर्चा में बने रहने व वोट बैंक की राजनीति के इस खेल में राजनेता एक तरफ़ वाहवाही लूट रहे है तो दूसरी तरफ़ इस राजनितिक प्रतिद्वंदिता का नुकसान उस गरीब जनता को भुगतना पड़ता है जिसे एक वक्त की रोटी के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। यदि रायबरेली व सिंगुर इन दोनों मामलों की बात की जाए तो इनमे एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है की जहां सिंगुर में नैनो प्लांट लगाने के लिए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्ठाचार्य ने हरसंभव प्रयास किया वही रायबरेली की रेल कोच फैक्ट्री को स्थापित करने में प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ही अड़ंगा लगा रही है। यदि रायबरेली में यह रेल कोच फैक्ट्री स्थापित होती तो लगभग ६०० लोगों को प्रत्यछ् व हजारों लोगों को अप्रत्यछ्य रूप से रोजगार के अवसर प्राप्त होते। इसके साथ ही लगभग २०० लघु उद्योगों के भी स्थापित होने सम्भावना थी लेकिन रोजगार के इस अवसर पर राजनीति की आरी चल गई।